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शिवपाल सिंह यादव, संघर्षों की एक मज़बूत दीवार या मजबूर खंडहर! एक परिचय!

शिवपाल सिंह यादव, संघर्षों की एक मज़बूत दीवार या मजबूर खंडहर!

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शिवपाल सिंह यादव, संघर्षों की एक मज़बूत दीवार या मजबूर खंडहर! एक परिचय!

समाजवादी आंदोलन को अपने परिश्रम से पल्लवित करने वाले समाजवाद के परिबध्द सिपाही का जन्म 6 अप्रैल 1955 को बंसत पंचमी के पावन दिन उत्तर प्रदेश के इटावा जिले मे हुआ। बचपन से ही शिवपाल सिंह यादव मानवीय संवेदनाओं के प्रति बेहद संवेदनशील रहे हैं।जिनके कारण सामाजिक सेवा ,असहाय गरीब लोगो की मद्द करना एंव कमजोर वर्ग के हक के लिए खड़े होना उनकी प्राथमिकता थी। मुलायम सिंह यादव उनके बड़े भाई हैं। शिवपाल सिंह यादव ने आम जनता के लिए संर्घष करना और कुशल नेत्रत्व मुलायम सिंह यादव जी के सानिध्य मे सीखा।

समाजवादी पार्टी के गठन में शिवपाल की भूमिका
समाजवाद की जड़ को सीचने के लिए उनके साथ हर मोर्चे पर कंधे से कंधा मिलाकर डटे रहे।उन्होनें सन् 1972 मे  हाईस्कूल  की और 1974 में इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी से बी पी डी की शिक्षा उत्तीर्ण की। बी पी डी की डिग्री मिलने के बाद उनकी शिक्षक के पद पर नियुक्ति हुई। लेकिन समाजवादी जन आंदोलन के ओर गहरा जुड़ाव होने के कारण उन्होनें नौकरी नहीं की और अपंनी पूर्ण लगन से समाजवादी आंदोलन से जुड़ गए। चौधरी चरण सिंह जेनेश्वर मिश्र रवि राय  राज नारायण जैसे बड़े नेताओ के आगमन पर भी उनकी सभा आयोजन की जिम्मेदारी भी  शिव पाल जी के ही कंधो पर होती थी। प्रमुख समाजवादी नेता शरद यादव के साथ उन्होंने  इटावा से गाजियाबाद तक की पथ यात्रा भी की। उन्हें जो भी जिम्मेदारी मिली उसे पूरी सहज़ता से निभाया।

Related imageआपातकाल मे भी दिया पार्टी को पूरा सहयोग
देश में आपातकाल के संघर्ष  पूर्ण समय में वह  बिना किसी परिणाम की परवाह किये अपने बड़े भाई मुलायम सिंह यादव सहित अन्य समाजवादी नेताओ के लिए भोजन और समाचार पत्र और अन्य आवश्यक साहित्य सामग्री की व्यवस्था करते थे ये उनकी नैतिकता को ही दर्शाता है जब नेता जी मुलायम सिंह यादव ने चुनाव लड़ा तो शिवपाल सिंह यादव का मुख्य उद्देश्य केवल अपने बड़े भाई की विजय ही थी ये वो दौर था जब उनके पास केवल २ जोड़ी ही कपड़े हुआ करते थे और कई बार तो वह गीले कपड़ो में ही संपर्क अभियान के लिए निकल पड़ते थे। और अभियान के दौरान ही उनके बदन पर कपडे सूखते थे इतना ही नहीं अपने गांव के ही एक चिकित्सक के यहां दिन में समय निकाल कर काम किया और उससे प्राप्त धन का प्रयोग प्रचार सामग्री खरीदने में करते थे। समाजवाद के प्रचार प्रसार के लिए जब मुलयाम सिंह जी बाहर के दौरों पर होते थे तो शिव पाल स्थानीय क्षेत्रों जिम्मेदारी उठाते हुए सभी तरह की चिंताओं से उन्हें मुक्त रखते थे, ये ही नहीं उस कार्यकाल में अखिलेश का ख्याल भी शिवपाल सिंह यादव ने ही रखा इसीलिए उन्हें मुलायम सिंह जी का लक्ष्मण कहा जाता हैं। उत्तर प्रदेश की तेरहवीं विधानसभा मे वह जसवंतनगर से विधानसभा चुनाव लड़े थे और भारी मतों से विजयी हुए। अपने जुक्षारूपन के कारण शिवपाल सिंह यादव युवाओं और यवा राजनीति मे भी बेहद लोकप्रिय हुए।

मुलायम ने शिवपाल को बनाया सहकारिता मंत्री
शिवपाल सिंह यादव मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं। 2012 में उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार बनने के बाद उन्हें लोक निर्माण, सिंचाई, सहकारिता मंत्री की जिम्मेदारी दी गयी। उन्होंने इन विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए कई बड़े अधिकारियों व अभियंताओं के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की। एक अखबार ने तो उन्हें ‘कार्यवाही मिनिस्टर’ तक की संज्ञा दे दी।

मुलायम सिंह यादव तथा शिवपाल सिंह यादव आख़िरी बार एक साथ दिखे!mulayam aur shivpal
समाजवादी पार्टी में अपनी उपेक्षा सार्वजनिक कर चुके पार्टी के सरंक्षक मुलायम सिंह यादव की करीबी एक बार फिर छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव के प्रति बढ़ गई है। लखनऊ में लंबे समय बाद मुलायम सिंह यादव तथा शिवपाल सिंह यादव एक साथ दिखे।
लखनऊ में लोहिया ट्रस्ट के ऑफिस में मुलायम सिंह यादव के साथ लंबे समय तक शिवपाल सिंह यादव ने बैठक की। लोहिया ट्रस्ट की बैठक के बहाने अखिलेश यादव सरकार में मंत्री रहे शिवपाल सिंह की समाजवादी पार्टी के सरंक्षक मुलायम सिंह यादव से मुलाकात हुई। पार्टी में सम्मान न मिलने के बयान के बाद इस मुलाकात को अहम माना जा रहा है।

अखिलेश युग मे समाजवादी पार्टी की टूट फूट और शिवपाल की स्थिति
सपा की किसी भी मीटिंग में शिवपाल सिंह यादव को नहीं बुलाया जा रहा था। उपेक्षा का ये सिलसिला लंबे समय से चल रहा था। जनवरी 2017 में लखनऊ के जनेश्वर मिश्र पार्क में आयोजित सपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में शिवपाल सिंह यादव को पार्टी से निष्कासित करने की घोषणा कर दी गई।
इसके बाद यूपी विधानसभा चुनाव 2017 के दौरान भी शिवपाल यादव की भारी उपेक्षा की गई। उन्हें प्रचारक ही नहीं बनाया गया। चुनावी रणनीति में महारत होने के बावजूद उनकी अनदेखी की गई और आखिरकार पार्टी को बुरी हार का सामना करना पड़ा।

समाजवादी सेक्युलर मोर्चे का गठन!
सपा के पूर्व मंत्री शिवपाल यादव का अलग मोर्चा बनाने की ये योजना कुछ दिनों की नहीं है। ये तो वो टीस है जो कई साल से शिवपाल के मन को विचलित कर रही थी। समाजवादी पार्टी में लगातार उपेक्षा का परिणाम ऐसे सामने आया कि उन्होंने समाजवादी सेक्युलर मोर्चे का गठन कर दिया है।

पढ़िए अगले अंक में > शिवपाल के संघर्षों का अंत या राजनीतिक चक्रव्यूह में फँसते अखिलेश! भाग 2

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