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आखिर क्या हैं गणतंत्र दिवस और इसके सही मायने?

Republic Day - What does this mean to We Indians!

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आखिर क्या हैं गणतंत्र दिवस और इसके सही मायने?

पिछले कई वर्षों से भारत तेज़ी से बदल रहा है। इंटर्नेट और मोबाइल 2G से अब 4G की स्पीड से चलने लगे हैं कॉल फ़्री हो गयी हैं और डाटा महँगा हो चला है और इस बार भी गणतंत्र दिवस हर बार की तरह बड़ी धूम धाम से मनाया जा रहा है। पर आखिर क्या हैं गणतंत्र दिवस और क्या है इसके सही मायने? क्या आज का भारत गणतंत्र है? क्या यह वही भारत है जिसे ध्यान में रखकर संविधान लिखा गया होगा?

देश 68वें गणतंत्र दिवस तक आ पहुंचा। लेकिन क्या हम गणतंत्र में गण यानी अपनी भूमिका समझते हैं? एक बात जान लें कि गणतंत्र में गण ही संप्रभु होता है। सारी सत्ता जनता में ही निहित है। लेकिन गूंगे को बोलने और पंखहीन को उड़ने की आज़ादी का क्या मतलब है! इसी तरह अवाम के ज्ञानवान बने बिना कोई भी गणतंत्र या अर्थतंत्र मजबूत नहीं होता। इसलिए ज्ञानवान बनना हमारा परम कर्तव्य है।

आज अजब सा विरोधाभास है। गणतंत्र दिवस उस संविधान के लिये है जिसके तहत जनता और सरकार दोनों में विश्वास पैदा होता है पर पिछले कई वर्षों में इतना सब हुआ कि जनता का सरकार व राजनैतिक दलों के ऊपर से विश्वास उठ गया है। यह चिन्ता का विषय है। पर इसमें अच्छाई यह भी कि शायद नेता व दल इन कुछ समझेंगे। और क्या हम भी समझेंगे? हमारे अधिकार समझाने के लिये चुनाव आयोग 25 जनवरी को  “National Voters Day” का आयोजन करता है। पर हम में से अधिकतर लोगों को अपने विधान सभा और लोक सभा क्षेत्र के बारे में नहीं पता, हमें ये भी नहीं पता होता की कौनसा प्रत्याशी चुनाव लड़ने जा रहा है और हम उसे क्यूँ चुने? नेता व पार्टियाँ भी हमारी इस नासमझी का बख़ूबी फ़ायदा उठती हैं और अपने प्रत्याशियों के टिकट ऊँचे दामों पे बेचती है जिन्हें आप के ही क्षेत्र के बाहुबली और अपराधिक छवि के लोग मुँह माँगे दामों पे ख़रीद लेते हैं और आप के सामने प्रचार, प्रसार और मुफ़्त समान, धन बल के चलने आपकी चहेती पार्टी से प्रत्याशी बन चुनाव जीत जाते हैं! और यही काम हर बार होता है, जनता अपना प्रत्याशी नहीं चुनती बल्कि उन्हें चुनती है जो पार्टी से टिकट ख़रीद के आप के सामने खड़ा होता है। और यह बात तो कोई भी मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी समझ सकता है कि, जो प्रत्याशी पार्टियों को करोड़ों पैसे खिला के आप के लिए चुनाव लड़ने वाला है वो जीतने पे आप के भले से पहले अपना नुक़सान भरेगा। और वो अपना नुक़सान आप के क्षेत्र के विकास कार्यों के लिए मिले सरकारी पैसों से ही भरेगा, और वो सरकारी पैसे कहीं और से नहीं बल्कि आप के ही दिए कर या टेक्स से आता है।

लगभग सभी पार्टियाँ अपने चुनावी वादों में भ्रष्टाचार मिटाओ, ग़रीबी मिटाओ के नारों के बीच मुफ़्त साईकिल, लैप्टॉप, मोबाईल, राशन और बेरोज़गारी भत्ता देने का वादा भी करती हैं कि चुनाव जिताओ और ये सब ले जाओं पर कभी सोचा है कि ये सब आता कहाँ से है और वो कहाँ से देगी? कोई भी सरकार या पार्टी अपनी जेब से आप को कुछ नहीं देती और वो अपने चुनावी दावे और ख़र्चों को पूरा करने या अपने नुक़सान की भरपाई के लिए आप से और अधिक टेक्स वसूलने लगती है! और बड़े बड़े भ्रष्टाचार करने लगती है यही सिलसिला आज़ादी से चलता आ रहा है पर सरकारें 70 सालों हमें इस क़ाबिल नहीं बना सकी कि हमें और हमारे बच्चों को अच्छी सरकारी शिक्षा मिले और शिक्षित को अच्छा रोज़गार मिल सके और ये सब चीज़ें वो अपनी कमाई से ख़रीद सकें? आख़िर क्यूँ? क्यूँकि अगर जनता मज़बूत हो गयी, भ्रष्टाचार मिट गया, ग़रीबी हट गयी तो वो वोट किस लालच पे देगी? आप भी सोचिए की आप फिर किन मुद्दों पे वोट देते?

हमारे शहीदों ने जो सोचा, जिस सोच से आगे बढ़े थे वो सोच पीछे रह गई है। गणतंत्र का अर्थ होता है हमारा संविधान – हमारी सरकार- हमारे कर्त्तव्य – हमारा अधिकार। हमारा संविधान हमें बोलने का व अपने विचार रखने का अधिकार देता है। पर कई सरकारें और पार्टियाँ इसका पुरज़ोर विरोध करती है। अब भी समय है चेत जायिए, जाति और धर्म की राजनीति से ऊपर उठिए, अपने अधिकारों के लिए लड़िए और वोट उसे दीजिए जिसने आपने अपना प्रत्याशी चुना हो उसे नहीं जिसे पार्टी ने आपसे बिना पूछे अपने लिए चुना हो या जिसने मुँह माँगे दामों पे टिकट ख़रीदा हो ! सही जनतंत्र से ही सही लोकतंत्र है और उसी से असली गणतंत्र!
जय हिंदी!
अनूप मिश्र – Social Writer & Blogger
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Social Media & Digital Marketing Strategist India.